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नई दिल्ली/चार लेबर कोड के विरोध में 12 फरवरी को प्रस्तावित देशव्यापी हड़ताल को लेकर मज़दूर संगठनों की तैयारियाँ तेज़ हो गई हैं। एटक के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड हरिद्वार सिंह ने कहा कि यह हड़ताल आज़ाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी मज़दूर हड़ताल साबित होगी। उन्होंने बीएमएस नेतृत्व से अपील की कि भले ही संगठन राजनीतिक कारणों से हड़ताल से दूर रहे, लेकिन मज़दूरों और कार्यकर्ताओं को अपने हक़ की लड़ाई में शामिल होना चाहिए।हरिद्वार सिंह ने कहा कि आज जो अधिकार मज़दूरों को आसानी से प्राप्त हैं, लेबर कोड लागू होने के बाद वे बेहद जटिल असंभव हो जाएंगे। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आने वाले समय में मज़दूर न तो मज़बूत ट्रेड यूनियन बना पाएंगे और न ही वेतन समझौते के लिए द्विपक्षीय वार्ता प्रणाली बनी रहेगी।उन्होंने कहा कि अभी हड़तालों को अवैध घोषित किया जाता है, लेकिन न तो आर्थिक दंड लगता है और न ही जेल होती है। नए कानूनों के तहत हड़ताल करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा और मज़दूरों पर भारी जुर्माना व दस वर्ष तक की जेल का प्रावधान लागू किया जा सकता है।पेंशन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि त्रिपक्षीय समझौते के आधार पर मिलने वाली पेंशन व्यवस्था समाप्त हो सकती है। निजी उद्योगों में पेंशन बनाए रखने और उसे नियमित रूप से देने का कोई ठोस प्रावधान नहीं रहेगा। इसके साथ ही पदोन्नति की निश्चित समय-सीमा भी खत्म होने की आशंका है।हरिद्वार सिंह ने कहा कि पूँजीपतियों का मूल उद्देश्य कम लागत में अधिक मुनाफ़ा कमाना होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में मुनाफ़ा सरकार का होता है और वह नियमों से संचालित होता है, जबकि निजी क्षेत्र में मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए मज़दूरों का शोषण ही एकमात्र औज़ार बन जाता है। लेबर कोड पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाला और सामाजिक सुरक्षा कानूनों को इतिहास का हिस्सा बनाने वाला साबित होगा।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मज़दूरों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं बचेगी। दुर्घटनाओं की स्थिति में घटना स्थल बदलकर पूँजीपतियों को बचाने की आशंका रहेगी। न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम 1948 आज भी पूरी तरह लागू नहीं है और नए कानूनों के बाद उसकी प्रासंगिकता ही समाप्त कर दी जाएगी।स्वास्थ्य सुविधाओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के मज़दूरों को आज देश के किसी भी अस्पताल में इलाज की सुविधा है, लेकिन निजी क्षेत्र में ऐसी सुविधा उपलब्ध होगी या नहीं, यह बड़ा सवाल है।उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा यह है कि न ट्रेड यूनियन बचेगी, न उनके नेता और न ही मज़दूरों की आवाज़। ऐसे में सरकार और पूँजीपतियों के सामने बिना हथियार के मज़दूर कैसे खड़े होंगे?हरिद्वार सिंह ने बताया कि देश की दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनें 12 फरवरी की हड़ताल की तैयारियों में दिन-रात जुटी हैं। उन्होंने कहा कि निजी बातचीत में बीएमएस के नेता भी चारों लेबर कोड को मज़दूर विरोधी मानते हैं। ऐसे में नेतृत्व भले ही हड़ताल से दूर रहे, लेकिन मज़दूरों को आगे आना चाहिए।उन्होंने दावा किया कि जिन क्षेत्रों में पिछले दस वर्षों में कभी हड़ताल नहीं हुई, वहाँ भी ज़ोरदार तैयारियाँ चल रही हैं। 12 फरवरी को कोयला, लोहा, सीमेंट, बैंक, बीमा, आंगनबाड़ी, मध्याह्न भोजन, रक्षा, बिजली समेत सभी क्षेत्रों के मज़दूरों के साथ किसान भी सड़कों पर उतरेंगे और यह हड़ताल आज़ाद भारत की सबसे बड़ी मज़दूर हड़ताल बनेगी।
